नई दिल्ली
केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच लंबी और बार-बार होने वाली तकरार पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि लगता है कि दोनों ने ही एक दूसरे से अपनी बात मनवाने का रुख अपना लिया है, इससे शासन और जरूरी सहयोग में परेशानी हो रही है। दोनों सरकारों के बीच जारी तकरार शीर्ष न्यायालय ने यह टिप्पणी अपने एक फैसले में की, जिसमें न्यायालय ने कहा कि दिल्ली विधानसभा और इसकी समिति के पास सदस्यों और बाहरी की उपस्थिति बाध्य करने की शक्ति है।

न्यायालय ने फेसबुक इंडिया के उपाध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (एमडी) अजीत मोहन और अन्य की याचिका भी खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने सदन द्वारा सम्मन जारी किये जाने को चुनौती दी थी। दरअसल, पिछले साल हुए उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों के सिलसिले में गवाह के तौर पर सदन में उपस्थित होने में नाकाम रहने पर यह जारी किया गया था। न्यायमूर्ति एस के कौल, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय की पीठ ने कहा कि यदि दोनों पक्ष अपनी बात मनवाने या उसे छोड़ने का रुख अख्तियार करेंगे तो इस तरह के सहयोग की जरूरत वाला शासन का कोई भी मॉडल काम नहीं कर सकता है।

केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच शक्तियों को लेकर रस्साकशी 2014 से चल रही है। हालांकि, जुलाई 2018 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि उपराज्यपाल (एलजी) के पास स्वतंत्र रूप से फैसले लेने की कोई शक्ति नहीं है और वह निर्वाचित सरकार की सलाह मानने के लिए आबद्ध हैं। शीर्ष न्यायालय ने आज के फैसले में केंद्र और दिल्ली सरकार को सहयोगी शासन पर सलाह दी और कहा कि आम आदमी पार्टी सरकार शक्तियों के विभाजन की संवैधानिक योजना को माने।

साथ ही, न्यायालय ने कहा कि केंद्र को अलग-अलग राजनीतिक शासन के साथ तालमेल के साथ काम करने की जरूरत है। पीठ ने कहा कि अच्छा काम करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार को कंधे से कंधा मिला कर चलना होगा या बेहतर शासन के लिए कम से कम साथ-साथ चलना होगा। न्यायालय ने कहा, ‘ऐसा करने में नाकाम होना उनके अपने-अपने जनादेश का सचमुच में अवज्ञा है।’

न्यायमूर्ति कौल ने 188 पृष्ठों का फैसला लिखते हुए कहा कि एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई थी और कानूनी एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इसे देखने की जरूरत को कम महत्व नहीं दिया जा सकता। पीठ ने कहा, ‘हालांकि हम इस बात का जिक्र करते हैं कि राज्य और केंद्र के बीच लंबी और बार-बार होने वाली तकरार की छाया शांति एवं सौहार्द्र का आकलन करने का इरादा रखने वाली समिति पर पड़ेगी…।’ कोर्ट ने कहा कि दिल्ली विधानसभा और इसकी समितियों को सदन के सदस्य या अन्य को उपस्थित होने और बयान देने के लिए तलब करने का अधिकार है।

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Author: Bulandaawaj

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